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कुछ पंक्तियान (Few Lines)

मेरे इस गुलिस्तान मे खिला करते थे गुल्शन कभी , बैठा करते थे इन पेडो की छाव मे हम यही कही , ज़ाने कैसा दिन था वो, हवा चली थी यही से कही, कि अब है वो उस पार और … Continue reading

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