मेरे इस गुलिस्तान मे खिला करते थे गुल्शन कभी ,
बैठा करते थे इन पेडो की छाव मे हम यही कही ,
ज़ाने कैसा दिन था वो, हवा चली थी यही से कही,
कि अब है वो उस पार और हम है यही के यही ।
-रुचित
Note: I wish I could type better in Hindi. I originally wrote these lines almost a decade back.